जब भी भारत में असाधारण प्रतिभा की बात होती है, हरियाणा के करनाल के कौटिल्य पंडित का नाम ज़रूर सामने आता है। लोग उन्हें प्यार से “गूगल बॉय” कहते हैं। ताज़ा खबरों और सोशल मीडिया की चर्चाओं के मुताबिक, मात्र 17 साल की उम्र में कौटिल्य ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में मास्टर ऑफ फिजिक्स की पढ़ाई के लिए कदम रखने जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में उनके शोध के संभावित क्षेत्रों जैसे कॉस्मोलॉजी, प्लाज़्मा फिजिक्स, डार्क मैटर और पार्टिकल थ्योरी की बात हो रही है। लेकिन एक प्रतिभा की उड़ान सिर्फ़ उसके मंज़िल तक पहुंचने की कहानी नहीं होती, बल्कि उन हाथों और कंधों की भी होती है, जिन्होंने उसे ऊंचाइयों तक पहुंचाया। इस कहानी में एक खास नाम है—गणित गुरु आर.के. श्रीवास्तव, जो बिहार के मशहूर शिक्षक हैं और अपनी “एक रुपये गुरु दक्षिणा” पहल के लिए जाने जाते हैं।
गुरु-शिष्य का अनमोल रिश्ताकौटिल्य पंडित और आर.के. श्रीवास्तव का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है। गूगल बॉय ने अपने शुरुआती दिनों में गणित की बारीकियां आर.के. श्रीवास्तव से सीखीं। इस बात का ज़िक्र खुद कौटिल्य ने मोटिवेशनल स्पीकर विवेक बिंद्रा के पॉडकास्ट में किया है। उनके पिता सतीश शर्मा भी कई मौकों पर आर.के. श्रीवास्तव की तारीफ कर चुके हैं, और ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। पुराने शैक्षिक कार्यक्रमों के वीडियो में दोनों को एक साथ देखा जा सकता है—कभी मंच पर बातचीत करते हुए, तो कभी शिक्षा से जुड़े किसी आयोजन का हिस्सा बनते हुए। यह रिश्ता सिर्फ़ मंच तक सीमित नहीं, बल्कि जिज्ञासा और ज्ञान की साझेदारी का प्रतीक है। कौटिल्य ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर आर.के. श्रीवास्तव को “बेहतरीन शिक्षक” कहकर उनकी तारीफ की है, जो उनकी गुरु के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है।
आर.के. श्रीवास्तव: एक अनोखी शिक्षण शैलीबिहार में मशहूर आर.के. श्रीवास्तव सिर्फ़ एक शिक्षक नहीं, बल्कि एक ऐसी पद्धति के प्रतीक हैं, जो कम खर्च में ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों तक शिक्षा पहुंचाने की बात करती है। उनकी “एक रुपये गुरु दक्षिणा” पहल सालों से चर्चा में है। स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया इसे गरीब लेकिन मेधावी छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता खोलने वाली पहल मानता है। कौटिल्य की प्रतिभा जन्मजात है—यह सच है। बचपन से उनकी भूगोल और सामान्य ज्ञान की गजब की याददाश्त ने उन्हें राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। यहां तक कि वे मशहूर टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर भी नज़र आए। लेकिन किसी भी प्रतिभा को सही दिशा देना एक गुरु का काम होता है। सोशल मीडिया और उपलब्ध साक्ष्यों से साफ़ है कि आर.के. श्रीवास्तव ने कौटिल्य की प्रतिभा को निखारने में अहम भूमिका निभाई।
गुरु का योगदान: आत्मविश्वास और दिशाएक शिक्षक का योगदान सिर्फ़ किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं होता। वह अपने छात्रों में आत्मविश्वास जगाता है, उन्हें नई दृष्टि देता है और बौद्धिक ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है। आर.के. श्रीवास्तव को गुरु कहने का मतलब यही है। भले ही वे मंच पर हों या न हों, उनके सिखाए सवाल, उनकी अभ्यास शैली और उनकी सादगी से बने मूल्य हमेशा छात्र के भीतर काम करते रहते हैं। कौटिल्य की सफलता में उनकी भूमिका कई स्तरों पर दिखती है—चाहे वह गणित की जटिल अवधारणाओं को आसान करना हो या जीवन के बड़े लक्ष्यों के लिए प्रेरित करना।
ऑक्सफोर्ड की राह: एक सामूहिक जीतकौटिल्य की ऑक्सफोर्ड यात्रा अब औपचारिक रूप ले चुकी है। यह सिर्फ़ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उनके परिवार, स्कूल, समाज और आर.के. श्रीवास्तव जैसे शिक्षकों की मेहनत का नतीजा है। ऐसे शिक्षक तालियों की चाह में नहीं, बल्कि छात्रों के दिमाग में सवाल जगाने में विश्वास रखते हैं। यही सवाल किसी किशोर प्रतिभा को लोकप्रियता से उठाकर विज्ञान की जटिल राहों तक ले जाते हैं। भारत में प्रतिभा की कहानियां बहुत हैं, लेकिन जब इन्हें मेहनत और गुरु-शिष्य के रिश्ते के ज़रिए देखा जाता है, तो ये समाज के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। कौटिल्य और आर.के. श्रीवास्तव की जोड़ी आज की तारीख में ऐसी ही एक मिसाल है, जो नई पीढ़ी के लिए रास्ते खोल रही है।
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