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Danish Malewar Struggle Story: पैदा होने से पहले लिखी तकदीर, 'दिहाड़ी मजदूर' पिता का करिश्मा हैं दानिश मालेवार, दलीप ट्रॉफी में जड़ा दोहरा शतक

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नई दिल्ली: होली के जबरदस्त सेलिब्रेशन में पूरा भारत डूबा हुआ था, लेकिन असल खुमार तो क्रिकेट का चढ़ा हुआ था। भारतीय टीम साउथ अफ्रीका के जोहान्सबर्ग के वांडरर्स स्टेडियम में विश्व विजेता बनने का सपना संजोए उतरने वाली थी। हर किसी की जुबां पर सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, जहीर खान, युवराज सिंह और श्रीनाथ के नाम थे। देश में हल्की ठंड में भी क्रिकेट ने माहौल गर्म कर रखा था। लेकिन 23 मार्च को जो कुछ हुआ वह क्रिकेट फैंस के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। टीम इंडिया को ऑस्ट्रेलिया ने हराकर विश्व कप का खिताब जीता, लेकिन बावजूद इसके यह वह साल था, जिसने भारत में क्रिकेट की रगों में तूफान भर दिया। युवा क्रिकेटर बनना चाहते थे तो जो हर पिता बच्चे को सचिन-सहवाग बनाने का सपना देखने लगा था। आखिर क्रिकेट का जुनून हर किसी के सिर चढ़े भी क्यों नहीं, यह वह दौर था जब क्रिकेट में पैसा देख रहा था। दौलत और शोहरत की बुलंदी पर पहुंचे क्रिकेटर हर किसी के हीरो थे। उन्हीं में से एक थे विष्णु मालेवार, जो इसी विश्व कप के साल 08 अक्टूबर, 2003 को जन्मे दानिश मालेवार के पिता हैं। उन्होंने तय कर लिया था कि बेटा हुआ तो क्रिकेटर बनाऊंगा।



नवभारत टाइम्स के स्पेशल सेगमेंट 'Sports Scan' में आज हम उसी दानिश मालेवार की कहानी से रूबरू करा रहे हैं। 21 साल के दानिश मालेवार अपने पहले ही रणजी सीजन में छा गए। धुरंधरों गेंदबाजों की रैली के बीच विस्फोटक बल्लेबाजी से हर किसी छाती पर तांडव किया और अब दलीप ट्रॉफी डेब्यू में दोहरा शतक ठोक दिया। वह लेग साइड से लेकर ऑफ साइड तक, पीछे से लेकर सामने तक, मैदान के हर कोने में शॉट देखने का दमखम रखते हैं। स्पिनर और पेसर हर किसी के बॉल का जवाब उसके पास होता है।



दलीप ट्रॉफी डेब्यू में मालेवार का दोहरा शतक

सबसे पहले तो जानते हैं कि आखिर मालेवार की इतनी चर्चा क्यों है। दरअसल, दलीप ट्रॉफी 2025 के दूसरे दिन सेंट्रल जोन के युवा बल्लेबाज दानिश मालेवार ने दोहरा शतक लगा दिया। वह विदर्भ के लिए घरेलू क्रिकेट खेलते हैं। नॉर्थ ईस्ट जोन के खिलाफ बेंगलुरु में दानिश ने दोहरा शतक लगाया। दानिश मालेवार दलीप ट्रॉफी में अपने डेब्यू मैच में शतक लगाने वाले विदर्भ के पहले बल्लेबाज बन गए हैं। खास बात यह है कि यह उनका लगातार दूसरा शतक है। इससे पहले उन्होंने पिछले सीजन के रणजी ट्रॉफी फाइनल में शतक लगाया था।



पिता ने जन्म से पहले से तय किया- अगर बेटा हुआ तो क्रिकेटर बनाऊंगा

दानिश मालेवार के जन्म से पहले ही तय हो गया था कि वह क्रिकेटर बनेंगे। यह फैसला उनके पिता ने किया था। दानिश के पिता विष्णु क्रिकेट के बड़े फैन थे। जब उनकी शादी हुई थी तभी विष्णु ने फैसला कर लिया था कि अगर बेटा हुआ तो क्रिकेटर ही बनाना है। हालांकि, अपने सपने को सच करना दानिश के पिता के लिए आसान नहीं था। आर्थिक तंगी से जूझने वाले विष्णु ने खुली आंखों से बेटे के लिए देखे सपने को साकार करने के लिए हाड़तोड़ मेहनत की। फिर वह समय भी आया जब उन्हें अपनी मेहनत का फल मिला और आज बेटे को टीम इंडिया में एंट्री का दावेदार माना जा रहा है। खासकर, उस नंबर पर, जिस पर भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट में राहुल द्रविड़ और चेतेश्वर पुजारा जैसे महान बल्लेबाज खेल चुके हैं।



पिता करते हैं डेली कलेक्शन का काम, 15-20 हजार महीने की कमाई

भंडारा रोड पर पारडी में रहने वाला मालेवार परिवार एक गरीब और साधारण परिवार से है। दानिश के पिता शुभलक्ष्मी सोसाइटी में डेली कलेक्शन (पिग्मी एजेंट) का काम करते हैं। जबकि उनकी मां हाउस वाइफ हैं। उनके पिता दिन भर धूप में चलकर महीने में केवल 15 से 20 हजार रुपये कमाते हैं। इससे परिवार का गुजारा मुश्किल से होता था। उन्होंने कोच नितिन गावंडे और स्वरूप श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में क्रिकेट के बुनियादी पाठ सीखे। जब वह बड़े नहीं हुए, तब तक उनके पिता दानिश को दोपहिया वाहन पर बिठाकर एकेडमी ले जाते, पारडी से रेशमबाग तक दस से बारह किलोमीटर की दूरी तय करते। उन्होंने दानिश करियर के लिए 15 साल तक साथ में कड़ी मेहनत की। बेटे ने भी अपने पिता की कड़ी मेहनत से क्रिकेट को अपना नाम बनाया।



लोगों से मिले बैट-पैड से भरी क्रिकेट की उड़ान

दानिश मालेवार ने 7 साल की उम्र में अकादमी जाना शुरू कर दिया था। अच्छी बैटिंग की वजह से शुरुआत में लोग उन्हें बैट और पैड जैसी चीजे दे दिया करते थे। मालेवार ने पिछले सीजन रणजी ट्रॉफी के दौरान एक इंटरव्यू में कहा था, 'मेरे पिता हमेशा से चाहते थे कि मैं क्रिकेटर बनूं। सात साल की उम्र में मैं अकादमी पहुंच गया था। उन्होंने कई मुश्किलों का सामना किया, लेकिन मेरी क्रिकेट की जरूरतों का पूरा ध्यान रखा। मेरे जूनियर क्रिकेट दिनों में जब मैं रन बनाता था, तो कुछ लोग मुझे बैट, पैड और ग्लव्स देते थे। अंडर-19 के बाद ही पैसे आने शुरू हुए।'



फर्स्ट क्लास क्रिकेट में दानिश का प्रदर्शन



10 मैच में 9 फिफ्टी प्लस स्कोर

दलीप ट्रॉफी का यह मुकाबला दानिश मालेवार के फर्स्ट क्लास करियर का 10वां मुकाबला है। इस दौरान उन्होंने 9 बार 50 या उससे ज्यादा रन बनाए हैं। सिर्फ दो ही ऐसे मैच रहे हैं, जिसमें वह 50 रनों तक नहीं पहुंच पाए। उन्होंने केरल के खिलाफ रणजी फाइनल में 153 और 73 रनों की पारी खेली थी। सेमीफाइनल में मुंबई और क्वार्टर फाइनल में तमिलनाडु जैसी मजबूत टीम के खिलाफ फिफ्टी लगाई थी। गुजरात के खिलाफ भी उनके नाम शतक है। अब दलीप ट्रॉफी में दानिश ने दोहरा शतक लगा दिया है।



अब जब वह विश्व पटल पर छाने को तैयार हैं तो क्रिकेट के लिए मक्का कहे जाने वाले भारत में वह उस मुकाम तक पहुंचना चाहेंगे, जहां खिलाड़ी को धर्म से परे, आस्था से ऊपर, जुनून की पराकाष्ठा और युवाओं के जोश के रूप में जाना जाता है। यह वह मुकाम है, जहां जब बल्ला गेंद से टकराता है तो जैसे करोड़ों लोगों की सांसें थम जाती हैं। जब चौके-छक्के लगते हैं तो मानो फैंस के जयघोष की आभा से स्टेडियम डूब जाता है। जहां फैंस के लिए क्रिकेट धड़कन है, क्रिकेटर धमनियों में प्रवाहित होने वाली ज्वाला और उसकी दीवानगी शांत, लेकिन समय-समय पर ज्वार और भाटा लिए उस समंदर की तरह है, जिसकी गहराई का अंदाजा लगा पाना नामुमकिन है। अब समय बताएगा कि पिता के सपनों को दिन-रात पीछा करने वाले दानिश कहां ठहरते हैं...।
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