एक 21 साल की लड़की का पैरंट्स के खिलाफ होते हुए भी जबलपुर जैसे छोटे शहर से मुंबई आकर बॉलीवुड एक्ट्रेस बनना किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं, लेकिन शालिनी पांडे ने यह असंभव सपना सच कर दिखाया। आज 'अर्जुन रेड्डी', 'जयेश भाई जोरदार', 'महाराज', 'डब्बा कार्टेल' जैसी बड़ी फ़िल्में और वेब शो कर चुकी शालिनी बिल्कुल ठीक कहती हैं कि उन्होंने अपनी ये किस्मत और कामयाबी खुद अपनी मेहनत और दृढ़ निश्चय से लिखी है। खास बातचीत: 'अर्जुन रेड्डी' की प्रीति हो या 'जयेशभाई जोरदार' की मुद्रा, 'महाराज' की किशोरी या 'डब्बा कार्टेल' की राजी, पर्दे पर आप भोली-भाली, सहमी हुई मासूम लड़कियों के रूप ज्यादा दिखी हैं। असल जिंदगी में आप खुद कैसी हैं? असल जिंदगी में मैं इन सबसे एकदम अलग हूं। मैं बहुत बेबाक हूं। बिंदास अपनी राय जाहिर करती हूं। बचपन से ही मैं अपनी बात रखने में कभी नहीं झिझकी। जब भी मुझे कुछ गलत लगता है तो मैं उस पर सवाल करती हूं। जबकि, मैं एक छोटे शहर के रूढ़िवादी परिवार से हूं। हमें सिखाया जाता है कि ऐसे बात मत करो। वो चाहे आपके पैरंट्स हों या रिश्तेदार, वे हमेशा बताते हैं कि ये नहीं करो, वो नहीं करो। इतने बजे बाहर नहीं जाना, इतने बजे घर आना चाहिए, इतनी सारी पाबंदियां होती हैं, मगर मैं सवाल करती थीं कि ऐसा क्यों? वहां ये भी होता है कि जब आप सवाल करते हैं तो लोग कहते हैं कि पलटकर जवाब दे रही है। फिर भी मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा कि मुझे चुप रहना चाहिए, डर जाना चाहिए। मैं बहुत मुंहफट इंसान हूं। ऐसे में, ये अजीब बात है कि मुझे ऐसी लड़कियों के किरदार ही ज्यादा मिले, जो अपनी आवाज नहीं उठा सकती थीं। मुझे लगता है कि यह ऊपर वाले की कुछ शक्ति है, क्योंकि मैं ऐसे लोगों या जानवरों से बहुत कनेक्ट करती हूं, जो प्यार से वंचित या बेजुबान होते हैं, अपनी बात नहीं रख पाते। मुझे लगता है कि मुझे ऐसे लोगों की आवाज बनने के लिए चुना गया है। मैंने अपने आसपास ऐसे लोग देखे हैं और उनके लिए मैं लड़ी हूं। जबलपुर में इंजीनियरिंग करते हुए आपको ऐक्टिंग का चस्का कैसे लगा?ऐसा कोई एक दिन नहीं था। जबसे मुझे याद है, मुझे ऐक्टर ही बनना है। जबकि, बचपन में हमें फिल्में देखने की भी इजाजत नहीं थी। पैरंट्स टीवी का केबल कनेक्शन तक काट देते थे, क्योंकि सारा जोर पढ़ाई पर था, पर मुझे लगता है कि इसकी कई वजहें रहीं। जैसे, शुरू में टीवी देखते हुए लगता था कि मुझे भी टीवी पर आना है, मगर बड़ी वजह यह थी कि मुझे जबलपुर से बाहर निकलना है। मुझे अपनी पहचान बनानी है। मुझे आजादी चाहिए, तो वक्त के साथ कई आयाम जुड़ते गए और यह जुनून भी बढ़ता गया। मुझे समझ में आया कि मैं दिल से एक कलाकार हूं। मैं 9 से 5 वाली नौकरी कर ही नहीं सकती हूं। मुझे अपनी भावनाओं को दिखाने के लिए जरिया चाहिए और इसके लिए ऐक्टिंग से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। ये मेरे लिए एक थेरपी है। जबकि, इतने छोटे शहर से होने के चलते कई बार ऐक्टर बनना असंभव सा सपना लगता है, फिर भी मन यही कहता था कि मैं कर लूंगी। आपके आने वाले प्रॉजेक्ट्स कौन से हैं?धनुष के साथ एक साउथ फिल्म पूरी होने वाली है। फिर, एक ओटीटी प्रॉजेक्ट आएगा। इसके अलावा, दो-तीन और एक्साइटिंग प्रॉजेक्ट्स हैं लेकिन उनके बारे में बात नहीं कर सकती। उम्मीद है कि जल्द उनकी घोषणा होगी। अपनी सीरीज डब्बा कार्टेल में शबाना आजमी जैसी दिग्गज ऐक्ट्रेस के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? क्या सीखा?शबाना आजमी सबसे कूलेस्ट इंसान हैं, जिनसे मैं मिली हूं। मैंने उनसे इतना सीखा कि पता नहीं कि कहां से शुरू करूं और कहां खत्म करूं। उन्होंने मुझे जिंदगी के सबसे बड़े सबक सिखाए हैं। इतनी अनुभवी होने के बाद भी उन्होंने एक यंग वुमन के तौर पर मुझे ऊपर उठाया। मुझे बराबरी का दर्जा दिया कि आप अपनी राय रखो, आप हम जितनी ही बराबर हो। वह मेरा ह्यूमर समझती थींं। जबकि, मेरे मजाक व्यंग्यात्मक होते हैं तो अगर आप उसे नहीं समझें तो आपको बुरा लग सकता है, लेकिन शबाना मैम ने मेरे ह्यूमर को मान्यता दी।
एक छोटे शहर की लड़की का ऐक्टर बनने अकेली मुंबई आना काफी रिस्की फैसला था। घरवालों का विरोध कैसे झेला?बहुत ज्यादा विरोध रहा। मैं अपने परिवार वालों के खिलाफ घर से निकलकर आई थी। लेकिन क्या है, अगर आपका लक्ष्य साफ है जो कि मेरे साथ था कि मुझे सच में यही करना है, फिर कुछ मुश्किल नहीं लगता। मुझे लगता है कि मैं भगवान की बच्ची हूं कि मुझे अपना उद्देश्य पता था। दूसरे, डरना मेरी फितरत में ही नहीं है। आप मुझसे दस साल पहले भी पूछती तो भी मैं यही कहती कि मुझे नहीं लगता किसी चीज से डर! एक दिन मैं शबाना मैम (शबाना आजमी) को अपनी जर्नी के बारे में बता रही थी तो वो बोली, ओह गॉड ये तो बहुत डरावना है, तुमने कैसे किया। तब मुझे लगा कि हां, एक 21 साल की लड़की बिना किसी सपोर्ट के, अपने परिवार वालों के खिलाफ जाकर यहां आना रिस्की तो है, लेकिन जैसा मैंने कहा, मेरी फितरत में ही डरना नहीं है। मेरे लिए मेरी आजादी बहुत जरूरी है। जो चीज मुझे वो आजादी देती है, उसके लिए कितना भी संघर्ष करना पड़े, वो मुझे संघर्ष नहीं लगता है। आपने 'अर्जुन रेड्डी' और 'जयेशभाई जोरदार' जैसी बड़ी फिल्मों से शुरुआत की। कम समय में कई बड़े प्रोजेक्ट्स का हिस्सा रहीं। किस्मत या मेहनत, किसका हाथ ज्यादा मानती हैं?देखिए, मैं किसी भी फिल्मी बैकग्राउंड से नहीं हूं। मेरे पीछे किसी का हाथ नहीं रहा, मैंने अपनी ये किस्मत खुद बनाई है। मेरी मेहनत, दृढ़ता, डटे रहना कि कुछ भी हो, मैं ये करके रहूंगी, इन चीजों ने मेरे लिए यह रास्ता बनाया। वह कहते हैं ना कि जहां चाह होती है, वहीं राह होती है, मेरा मानना है कि किस्मत भी उसी का साथ देती है, जो कड़ी मेहनत करते हैं। उसके बगैर कुछ नहीं होता, तो मेरे लिए कड़ी मेहनत सबसे आगे आती है। बाकी सब उसके बाद आता है।
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