एक प्रसिद्ध पंक्ति है, "जब हौसला ऊंची उड़ान का बना लिया, तब आसमान का कद देखना फिजूल है।" इस विचार को साकार किया है एक ऐसे व्यक्ति ने, जो एक साधारण मिट्टी के मकान में रहता है। उसने अपने अदम्य साहस और जज़्बे से एक ऐसा कार्य किया है, जो कई लोग नहीं कर पाते।
पिता का साया खोने के बाद
इस व्यक्ति ने कम उम्र में अपने पिता को खो दिया था, लेकिन उसने कभी भी अपने हौसले को कमजोर नहीं होने दिया। इस संघर्ष ने उसे सफलता की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। रामधारी सिंह 'दिनकर' की पंक्तियां याद आती हैं, "खम ठोक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड़।" वास्तव में, इस युवक ने ऐसा कार्य किया है कि यह पंक्ति सच साबित होती है।
अरविंद कुमार मीणा की कहानी
यह कहानी है अरविंद कुमार मीणा की, जो राजस्थान के दौसा जिले के नाहरखोहरा गांव में रहते हैं। उनका परिवार बेहद गरीब है, लेकिन उन्होंने मेहनत और धैर्य से गरीबी को पार करते हुए सफलता की एक नई कहानी लिखी।
पिता की मृत्यु और मां का संघर्ष
अरविंद कुमार मीणा ने 12 साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया। इस घटना ने उनके परिवार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया। उनकी मां ने मेहनत करके अपने बेटों को पढ़ाने का जिम्मा उठाया।
शिक्षा में बाधाएं
अरविंद की मां ने कठिनाईयों के बावजूद उन्हें पढ़ाया। हालांकि, एक समय ऐसा आया जब अरविंद ने पढ़ाई छोड़ने का मन बना लिया था। लेकिन उनकी मां ने उन्हें हिम्मत दी और उन्होंने फिर से मेहनत करने का निर्णय लिया।
सफलता की ओर कदम
अरविंद की मेहनत रंग लाई और उनका चयन सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) में सहायक कमांडेंट के पद पर हुआ। लेकिन उनकी मंजिल कुछ और थी। उन्होंने यूपीएससी की तैयारी जारी रखी और अंततः उन्होंने परीक्षा में 676वां रैंक और SC वर्ग में 12वां स्थान प्राप्त किया। इस तरह, उन्होंने अपनी और अपने परिवार की तक़दीर बदल दी।
प्रेरणा का स्रोत
अरविंद की यह कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो सुविधाओं की कमी का रोना रोते हैं और जीवन में कुछ भी करने से पहले हार मान लेते हैं।
अरविंद की तस्वीरें
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